Monday, June 18, 2012

अज़ीब शख़्स था, आँखों में ख़्वाब छोड़ गया
वो मेरी मेज़
पे, अपनी किताब छोड़ गया

नज़र मिली तो अचानक झुका के वो नज़रें
मेरे सवाल
के कितने जवाब छोड़ गया

उसे पता था, कि तन्हा न रह सकेंगे हम
वो गुफ़्तगू
के लिए, माहताब छोड़ गया

गुमान हो मुझे उसका, मिरे सरापे पर
ये क्या
तिलिस्म है, कैसा सराब छोड़ गया

सहर के डूबते तारे की तरह बन
हर एक दरीचे
पे जो आफ़ताब छोड़ गया

2 comments:

ANULATA RAJ NAIR said...

वाह...
खूबसूरत...

अनु

Shalini kaushik said...

उसे पता था, कि तन्हा न रह सकेंगे हम
वो गुफ़्तगू
के लिए, माहताब छोड़ गया
very nice .
please remove word verifications--go to >settings>comment>verifications -nevar .thanks.